मजदूरों के पलायन पर प्रधानमंत्री की खामोशी देश का दुर्भाग्य

वासुदेव शर्मा


इन दिनों इंसान से जरा सा भी लगाव रखने वाला व्यक्ति दुखी है। वह मजदूरों के पलायन की भीषण त्रास्दी के समय सरकार के पलायन कर जाने से गुस्से में भी है। भारत मानव इतिहास के सबसे बड़े पलायन का सामना कर रहा है, पलायन की ऐसी तस्वीरें अब तक दुनिया के दूसरे देशों से आती थीं, जो दुनिया अब भारत से देख रही है। मां बेटे को, बेटा मां को, पिता बच्चों को गोद में लिए 500-1000 किलोमीटर दूर भूखा प्यासा पैदल चला रहा है और 5 ट्रिलियन इकानामी की बात करने वाले मोदीजी, उनकी सरकार सो रही है या यूं कहें कि मुश्किल वक्त में वह पलायन कर चुकी है। मजदूरों के पलायन पर सिर्फ मोदी सरकार ने ही पलायन नहीं किया है बल्कि भाजपा और आरएसएस के नेता भी चुप्पी साध गए हैं, उनके समर्थक मजदूरों के प्रति दिखावे की हमदर्दी भी नहीं जता रहे हैं, इससे ऐसा लगता है जैसे मजदूरों का पलायन संघ-भाजपा की रणनीति का हिस्सा हो। वैसे भी संघ-भाजपा की विचारधारा में मजदूर फिट नहीं बैठता, वह मजदूरों को अपना वैचारिक दुश्मन मानती है और कोरोना के बहाने वह उससे दुश्मनी निकाल रही है।


सड़कों पर पुलिस तैनात है, उसके डर से मजदूर जंगल के रास्ते जा रहा है, रेल की पटरियों से गुजर रहा है, जहां हार-थककर सो जाने पर मारा जा रहा है। चोरी-छिपे ट्रकों, डंफरों में बैठकर जा रहा है, जिनके पलट जाने पर मौत का शिकार हो रहा है। इधर-उधर से सोशल मीडिया के जरिए आ रही जानकारियां 45 दिन के पलायन में 2000 से अधिक मजदूरों की मौत हो जाने की हैं। मजदूरों की मौत का यह आंकड़ा हर दिन बड़ रहा है, आज सुबह नरसिंहपुर में ट्रक के पलट जाने से यूपी के 5 मजदूरों की मौत एवं 14 के घायल होने की खबर थी। दूर दराज के जंगलों, रेल पटरियों, सड़कों के रास्ते पलायन करते मजदूरों की भूख प्यास से होने वाली मौतों की खबरें नहीं आ पा रही हैं, जब यह आनी शुरू होंगी, तब तस्वीर नरसंहार जैसी होंगी, जिनमें मौतों की गिनती कर पाना असंभव होगा।  130 करोड़ की आबादी वाले देश में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं हैं, जिसने अपने जीवन में ऐसी त्रास्दी देखी हो, मोदीजी की सरकार ने वह भी दिखवा दीं। यहां हैरानी की बात यह है कि करोड़ों मजदूर भूखे-प्यासे पलायन कर रहे हैं और संघ-भाजपा समर्थकों के पास मजदूरों के प्रति सहानुभूति का एक शब्द तक नहीं हैं, इसीलिए वेे पलायन करते मजदूरों पर पूरी तरह खामोश हैं। वह तो भला हो देश की आम जनता का जो जगह-जगह पलायन करते मजदूरों की मदद करते हुई दिखाई दे जाती है।


मजदूरों के पलायन ने मोदी सरकार को पूरी तरह निर्व कर दिया है। राहत पैकेज के दावे झूठे साबित हो चुके हैं। मजदूरों के जितने भी इंटरव्यू आए, हर मजदूर यही कह रहा है कि उसे सरकार की तरफ से एक पैसे की भी मदद नहीं मिली, जिनके यहां काम करते थे, उन्होंने भी वेतन नहीं दिया।
पलायन करता मजदूर एक ही बात कह रहा है कि उसे घर जाना है। वह शहरों में नहीं रुकना चाहता, यहां वह भूख से मर जाएगा। सरकार जिसके पास रेलें हैं, बसें हैं एवं दूसरे परिवहन के साधन हैं क्या वह अपने ही देश के मजदूरों को उनके घर नहीं पहुंचा सकती? विपक्ष के दबाव में शुरू की गईं श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में मजदूरों से किराया लिया जा रहा है, अब कांग्रेस अध्यक्षा की पहल पर कुछ राज्यों में कांग्रेस ने श्रमिकों के किराए की जिम्मेदारी उठानी शुरू कर दी है। क्या कोई सरकार इतनी निर्दयी एवं अमानवीय हो सकती है जो अपने ही भूखे-प्यासे लोगों को मुफ्त में उनके घर न पहुंचा सके? मोदी सरकार क्रूर एवं अमानवीय है, जो मजदूरों की जिम्मेदारी उठाने से पीछे हठ चुकी है, यह अपने आप में एक त्रास्दी ही है।


मोदीजी चाहते तो मजदूरों को इस संकट से बचा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। क्यों नहीं किया? यह समझने के लिए भाजपा की राजनीति को समझने की समझ होना जरूरी है। एक तरफ तो मोदीजी की सरकार विदेशों में रहने वाले भारतीयों को जनवरी से ही लाना शुरू कर देती है और लोकडाऊन करने से पहले उन सभी रईश भारतीयों को उनके घहर पहुंचा देती है, वहीं दूसरी तरफ देश के अंदर रह रहे नागरिकों जिनमें बड़ी संख्या में मजदूर हैं उन्हें उनके घर तक पहुंचने का समय तक नहीं दिया जाता। जिस तरह मोदीजी ने अपने चहेते रईशजादों को लोकडाऊन से पहले उनके घर पहुंचा दिया, वैसे क्या मजदूरों को उनके घर नहीं पहुंचाया जाना चाहिए था? लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया, जिससे स्पष्ट है कि मोदीजी की सरकार मजदूर, गरीब विरोधी है, जिसकी कीमत मजदूर पलायन के रूप में चुका रहा है।

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