मजदूरों से मुंह मोड़ चुकी मोदी सरकार, इसीलिए पलायन पर है चुप्प?

वासुदेव शर्मा

सरकार के पास 20 लाख करोड़ हैं। 14,500 रेलें खड़ी हैं। गोदाम अनाज से भरे हैं। इसके बाद भी देश का मजदूर खाली जेब, भूखा प्यासा अपने-अपने घरों की ओर पैदल चला जा रहा है। मजदूरों के पलायन का ऐसी तस्वीरें, इससे पहले शायद ही कभी भारत तो छोडि़ए दुनिया के किसी देश से आई हों। पहली बार है जब लिखने वालों के पास मजदूरों की पीड़ा लिखने के लिए शब्द नहीं बचे। चैनल के रिपोर्टर मजदूर जो कह रहा है, उसे ही दिखा रहे हैं, शायद उनका शब्दकोष खत्म हो चुका है। हर दिन पलायन की दिल दहला देने वाली तस्वीरें आ रही है, जिन्होंने हर संवेदनशील व्यक्ति को नि:शब्द कर दिया है। मजदूरों का पलायन मानव इतिहास की सबसे अमानवीय एवं क्रूरतम घटना है, जिसके लिए मोदी सरकार इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुकी है। शकुनियों की सलाहों पर चल रही धृष्टराष्टों की सरकार इतनी असंवेदनशील भी हो सकती है, यह शायद ही किसी ने सोचा हो। हालांकि नोटबंदी के समय वह ऐसा इशारा कर चुकी थी।


सरकार को पता था कि देश में करोड़ों की संख्या में असंगठित मजदूर है, जो ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों में काम कर रहे हैं, अपनी जीविका चला रहा है और आर्थिक गतिविधियों की पहिया बने हुए हैं। इन मजूदरों के पास शहरों में न तो रहने के लिए ठीक-ठाक जगह है और न ही इतना पैसा कि महीने दो महीने बिना काम के गुजार सके। मजदूरों के बारे में सभी तरह की जानकारी होने के बाद भी सरकार ने बिना तैयारी के लोकडाऊन का फैसला किया, वह भी बिना किसी से विचार-विमर्श किए। संसद में चर्चा नहीं की गई। मुख्यमंत्रियों से राय नहीं ली गई। विपक्ष से भी बात नहीं की। नतीजा देश करोड़ों मजदूरों के पलायन के रुप में भुगत रहा है।

सड़कों पर रोता, बिलखता मजदूर सरकार से पैकेज नहीं मांग रहा है। वह घर जाना चाहता है, जिसके लिए साधन चाहिए। साधन सरकार के पास हैं, जिसे वह देना नहीं चाहती। 14,500 रेल गाडिय़ां यार्डों में खड़ीं हैं। लाखों बसें हर शहर में रूकी हुई हैं। जो सड़कों पर पैदल चलते मजदूरों के लिए लगाई जा सकती थीं, लेकिन नहीं लगाई गईं। वजह बताई गई कि पलायन करते मजदूरों को रेलों एवं बसों से भेजेंगे, तब कोरोना तेजी से फेलेगा। कोरोना को यदि पलायन करते मजदूरों के जरिए ही फैलना है, तब तो वह जब पैदल चलकर घर पहुंचेंगे, तब भी फैलेगा। कोरोना रेल और बसों से मजदूरों को भेजने से फैलेगा, लेकिन देश विदेश से हवाई जहाजों से ढोए जा रहे रईशों से नहीं। पलायन करते मजदूरों पर प्रधानमंत्री मोदीजी सहित सरकारों की खामोशी यही बता रही है। कोरोना के बारे में अब तक की जानकारी यही है कि वह विदेश से आया है, जिसे सरकार हवाई जहाज से ढोकर लाई है।


करोड़ों मजदूर लोकडाऊन के 50वें दिन तक सड़कों पर चला जा रहा है। पलायन करते हजारों मजदूर मर चुके हैं। पलायन की तस्वीरों के साथ-साथ अब मजदूरों की मौतों की खबरें भी बड़ी संख्या में आने लगी है। मीडिया यह सब जानकारी दे रहा है, सरकार तक भी पहुंच रही हैं। मोदीजी को भी पलायन की पल-पल की जानकारी है, इसके बाद भी वे 20 लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा करते समय भी मजदूरों के पलायन पर चुप रहे। आत्मनिर्भर भारत अभियान के लिए दिए गए पैकेज में पलायन करते मजदूरों के लिए फौटी कौड़ी नहीं हैं, उन्हें तो इसी तरह पैदल घर पहुंचना है, उन्हें सरकार ने उनके हाल पर छोड़ दिया है। जिस तरह मजदूरों की पीड़ा लिखने के लिए शब्द नहीं बचे हैं, उसी तरह मोदी सरकार की आलोचना के लिए भी शब्दों की कमी पडऩे लगी है।
यह धृष्टराष्ट्रों की सरकार है, जो षड्यंत्रों से चलाई जा रही है। 6 साल से वह सिर्फ विपक्ष के खिलाफ तिकड़में रच रही है, उसे बदनाम करने के षडयंत्रों का खेल, खेल रही है। जेएनयू के बहाने मजदूरों, गरीबों, दलित आदिवासियों की बात करने वालों को निशाना बनाया, उन्हें गिरफ्तार किया गया। शकुनियों की सलाहों पर चल रही सरकार जानती है कि मुसलमानों पर हमला करने से सैक्यूलर सोच के लोग इसके खिलाफ बोलेंगे, तब उन्हें मुल्ला मौलबी, पाकिस्तानी बताकर अपनी राजनीति को आगे बढ़ाते रहेंगे। मोदी सरकार ने 6 साल इसी तरह के षडय़ंत्रों में निकाल दिए। आज जब कोरोना महामारी से सामना हुआ, तब अपनी सरकार होने की जिम्मेदारी से भी भाग खड़ी हुई है। जिस देश के करोड़ों लोग पलायन कर रहे हों, उस देश का प्रमुख उनके पलायन पर खामोश रहे और कुछ भी नहीं बोले, तब उसे जिम्मेदारियों से भाग जाना ही कहेंगें। जनता सरकार को मुश्किल वक्त में काम आने के लिए ही चुनती है और जब मुश्किल समय में सरकार साथ छोड़ दे, तब इसी तरह के पलायन की तस्वीरें सामने आती हैं, जो इस समय देश के हर कौने से आ रही हैं।

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