मजदूरों की मौत एवं लाचारी का तमाशा देख रही मोदी सरकार

वासुदेव शर्मा

135 साल पहले भले ही मजदूरों के पास किसी तरह के अधिकार नहीं थे, लेकिन तब भी क्रूर शासकों ने मजदूरों को जिंदा रखने के लिए खाने का इंतजाम किया हुआ था, क्योंकि वे गुलामी कराने के लिए मजदूरों के जिंदा रहने का महत्व समझते थे। बिना अधिकार के गुलामी सहते रहने के खिलाफ 135 साल पहले 1885 में जब मजदूर पेरस की सड़कों पर उतरा तब वह 8 घंटे काम का अधिकार हासिल करके ही काम पर लौटा। दुनिया के मजदूर 1 मई को इसी पहली जीत का जश्न अब तक मनाते हैं। 135 साल बाद आज हम जब भारत की सड़कों पर पलायन करते मजदूर को देखते हैं, तब पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि मोदी सरकार भारत के मजदूरों को 135 साल पहले की स्थिति में पहुंचाने पर तुली है, इसीलिए उसके 2 लाख करोड़ के पैकेज में मजदूरों के लिए एक पाई तक की नगद मदद नहीं दी गई है। यहां तक कि अपने चार-चार संबोधनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मजदूरों की स्थिति पर एक शब्द तक नहीं बोला।

 

प्रधानमंत्री मोदीजी जिस दिन लोकडाऊन के बीच का आखिरी संबोधन दे रहे थे, उस दिन देश की सड़कें मजदूरों से भरी हुई थीं। करोड़ों मजदूर पैदल अपने-अपने घरों की ओर पलायन कर रहे थे, लेकिन वे इस दिन भी खामोश रहे। प्रधानमंत्री मोदी एवं उनकी सरकार की खामोशी कह रही है कि वह मजदूरों की मौत एवं लाचारी का तमाशा देख रही है, जिसे शासक का अपनी जनता के प्रति क्रूरतम व्यवहार कहा जा सकता है। सड़कों पर पैदल भटकता मजदूर, अनगिनत तकलीफें सहता मजदूर सरकार से सिर्फ घर जाने के लिए साधनों की मांग कर रहा है। वह मोदी हुकूमत न तो पैसे मांग रहा है, न खाने का इंतजाम करने की बात कर रहा है। 14,500 ट्रेनें यार्डों में खड़ी हैं, लेकिन सरकार इन्हें पलायन करते मजदूरों के लिए नहीं लगा रही, तब इसे सरकार की मजदूरों के प्रति घृणा और नफरत ही कहा जाएगा, जिसके कारण उसने मजदूरों को मरने के लिए उनके हाल पर छोड़ दिया है। यह मोदी सरकार की मजदूरों के प्रति आपराधिक लापरवाही है, जिसके लिए इतिहास उसे कभी माफ नहीं करेगा।

कोरोना आपदा में भी मोदी सरकार अपने पूंजीपति मित्रों के लिए अवसर पैदा कर रही है, उनके लिए बैंकों की तिजोरियां खोल दी गई हैं। 20 लाख करोड़ के पैकेज के नाम पर मालिकों को बैंकें लूटने की हरी झंडी दे दी गई हैं। 20 लाख करोड़ के लोन मैले में मजदूरों के लिए 7,500 रुपए महीने की नगद राहत नहीं दी गई है, जिसकी मांग भाजपा एवं आरएसएश को छोड़ देश की सभी राजनीतिक पार्टियां एवं सामाजिक संगठन कर रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने घोषणा की कि मजदूरों के किराए का इंतजाम कांग्रेस इकाईयां करेंगी, इसके बाद मोदी सरकार को शर्म आई, वह श्रमिक स्पेशन ट्रेनें चलाने के लिए मजबूर हुई, लेकिन इन श्रमिक ट्रेनों में भी मजदूरों से किराए वसूले गए, गुजरात में तो भाजपा-संघ के लोग टिकट तक बेच रहे हैं।
भारत इस समय दुनिया के सबसे बड़े पलायन का सामना कर रहा है, इसे लोग मानव इतिहास का सबसे बड़ा पलायन कह रहे हैं, जिसमें नौनिहाल बच्चे, बुजुर्ग, विकलांग, गर्भवती महिलाएं पलायन को मजबूर हुई हैं। पलायन करते मजदूरों की तस्वीरों ने हर संवेदनशील व्यक्ति को नि:शब्द कर दिया है, सड़कों पर मजदूरों को जितनी भी मददें मिल रही हैं, राहतें बांटी जा रही हैं, वही उनके पास पहुंच रही है, यह काम समाज का वह संवेदनशील तबका कर रहा है, जिसकी आंखें पलायन करते मजदूरों की पीड़ा से नम हैं। जो लोग मजदूरों के इस पलायन पर भी विचलित नहीं हुए हैं, वे इंसान नहीं रह गए हैं, यह लोग भी मोदी सरकार की तरह पलायन करते मजदूरों की मौत एवं लाचारी का तमाशा डाइंग रूमों में बैठकर देख रहे हैं। क्रूर एवं अमानवीय हुकूमत के साथ-साथ ऐसे लोगों से भी देश को बचाने की जरूरत है।

मीडिया का एक हिस्सा भी बेशर्मी की सारी हदें पार कर चुकी है, वह कोरोना महामारी में नफरत फैलाता रहा है, संघ-भाजपा की नफरती राजनीति का हिस्सा बनकर रह गया, इसीलिए उसे पलायन करते मजदूरों की पीड़ा तब तक सुनाई नहीं दी, जब तक कि सोशल मीडिया के जरिए उस तक लानतें नहीं भेजी गईं। आज यदि सोशल मीडिया नहीं होता, उस पर सक्रिय कुछ लोग नहीं होते, तब शायद ही पलायन करते मजदूरों की पीड़ा देश देख पाता। मुख्यधारा के मीडिया का छोटा सा हिस्सा, कुछ पत्रकार एवं सोशल मीडिया एक्टिविट्स ने मिलकर मजदूरों के पलायन को देश दुनिया में मुद्दा बना दिया, इसके लिए ऐसे सभी संवेदनशील लोगों की हमेशा सराहना होती रहेगी, यदि यह लोग नहीं होते, तब मोदी सरकार, उसका मीडिया मजदूरों के पलायन को भी गुमनामी में पहुंचा चुका होता तथा पलायन करते मजदूरों से भी मोदीजी की प्रशंसा के किस्से-कहानियां सुनवा रहा होता। बहरहाल, कोरोना महामारी में मोदी सरकार पूरी तरह निर्व हो गई है, उसका अमानवीय चेहरा सबके सामने आ गया है।

 

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