संघ के स्वयंसेवकों को निर्देश: तटस्थ रहें, मोदी की तरफदारी से बचे?

वासुदेव शर्मा

सोशल मीडिया पर कुछ दिनों से आरएसएस के स्वयंसेवकों, भाजपा कार्यकर्ताओं और इनकी आईटी सेल की सक्रियता कम हुई है, जो थोड़ी बहुत दिख रही है, उसमें अभद्रता पहले से काफी कम है। अचानक आए इस बदलाव से सोशल मीडिया के वे लोग हैरान हैं, जिनकी पोस्टों पर यह लोग टूट पड़ते थे, ऊल-जलूल टिप्पणियां कर उकसाने की कोशिश करते थे। अचानक आया यह बदलाव हैरान तो करता ही है साथ ही यह भी सोचने को विवश करता है कि आखिर ऐसा हुआ कैसे और क्यों? संघ से जुड़े कुछ मित्रों से मिला, उनसे बातचीत करने पर पता चला कि स्वयंसेवकों को कुछ समय तक सोशल मीडिया पर तटस्थ रहने तथा सरकार की तरफदारी करने से बचने के लिए कहा गया है, इसीलिए इन दिनों सोशल मीडिया पर स्वयंसेवकों की ऊल-जलूल पोस्टों में कमी आई है।

बीते चार-पांच दिनों में 5-7 संघ से जुड़े मित्रों से मिला। देश के वर्तमान माहौल पर बातचीत करने की कोशिश की। स्थिति ठीक नहीं है, यह कहकर वे बातचीत को आगे बढऩे से रोकने की कोशिश करते, लेकिन संभव नहीं था, इसीलिए बातचीत कोरोना और आज की स्थिति पर शुरू होती और यहीं आकर खत्म। धीरे-धीरे वे खुलते हैं और कहते हैं हम जैसे छोटे-छोटे काम वाले लोग तो बड़ी मुश्किल में हैं, कब पहले जैसी स्थिति में आएंगे, कुछ नहीं कह सकते।
मैंने कहा- आज कल आप लोग कुछ निष्क्रिय लग रहे हो। सोशल मीडिया पर मोदीजी के खिलाफ माहौल है। आप चुप्प हैं, यदि आप लोग इसी तरह चुप रहे, तब तो बना बनाया सारा खेल बिगड़ जाएगा और कोरोना में मोदीजी की बनी बनाई छवि नष्ट हो जाएगी।

मेरी बात सुनकर वेे थोड़ा गंभीर हुए और वोले अभी चुप्प रहना ही सही है। लोकडाऊन के पहले और दूसरे चरण तक तो ठीक-ठाक चल रहा था, लेकिन उसके बाद स्थितियां एकदम बदल गई। करोड़ों मजदूरों के पैदल पलायन ने मोदीजी की सरकार को नुकसान पहुंचाया है। आज हर व्यक्ति एक सवाल करता है कि सरकार को पहले मजदूरों को उनके घर पहुंचाना था, उसके बाद लोकडाऊन करना था। लोगों के इस सवाल का जबाव हमारे पास नहीं हैं, इसीलिए हम चुप्प हैं। गरीबों की मदद के सरकार के जितने भी दावे किए गए थे, वे गलत साबित होते जा रहे हैं।

स्वयंसेवक जब बातचीत में खुलता है, तब वह बहुत कुछ ऐसा बताता है, जिसके बारे में लोग सोचते तक नहीं हैं। उन्होंने बताया कि लोकडाऊन के 50 दिनों में लोगों के सोच में बदलाव आया है। इसका कारण उनके पास खाली समय का होना है। इस खाली समय में लोगों ने टीवी देखी, समाचार सुने, अखबार पड़े और भरपूर सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया। इन 50 दिनों में उसे वह सब पता चल गया, जो इससे पहले तक उसके पास नहीं पहुंचा था। घरों में बैठे लोगों ने मजदूरों के पलायन की दर्दनाक तस्वीरें देंखीं, उन्होंने भूखे-प्यासे भटकते गरीब देखे। सरकारी मदद न मिलने के समाचार पढ़े। घरों में खाली बैठे लोगों ने जब इन स्थितियों का मंथन किया, तब उसने पाया कि सरकारों के दावे झूठे हैं यदि सरकार का एक भी दावा सही होता, तब मजदूर अपने मासूम बच्चों को लेकर पलायन नहीं करते। लोगों में यह धारणा बनने लगी है कि मोदीजी मनमानी करते हैं, जिसकी कीमत आम लोग चुकाते हैं। कोरोना में लोग नोटबंदी के समय को भी याद कर रहे हैं।

उनका यह भी कहना था कि ऐसा नहीं है कि संघ ने अपने समर्थक मध्यमवर्ग को व्यस्त रखने के लिए कोई काम नहीं किया। टेलीविजन पर रामायण, महाभारत जैसे लोकप्रिय धारावाहिक शुरू कराए। शिवपुराण, चाणक्य जैसे सीरियल भी शुरू हुए। घर-घर में एकल शाखाएं लगाने के आव्हान किए गए। घरों में धार्मिक गतिविधियां चलाते रहने के लिए कहा गया। ताली, थाली एवं दिए जलाने के आयोजन भी इसीलिए किए गए थे। सेवाभारती के जरिए गरीब बस्तियों में सेवा कार्य करने के आव्हान किए गए। संघ की यह कोशिशें स्वयंसेवकों को भी सक्रिय नहीं रख सकीं। एकल शाखाएं औपचारिकता बनकर रह गईं। धार्मिक सीरियल भी लोगों को व्यस्त नहीं रख सके। कुल मिलाकर हम लोग अपने अपने प्रभाववाले लोगों को लंबे समय तक व्यस्त नहीं रख सके और उन तक कोरोना महामारी में गरीबों, मजदूरों की स्थिति की दर्दनाक दास्ताएं पहुंचने लगीं और वे उन्हें ज्यादा गंभीरता से लेने लगे और उन पर मंथन करने लगे, जिसमें उन्होंने पाया कि सरकारों ने जो कदम उठाए हैं, वे नाकाफी हैं, जिस कारण ही गरीब मजदूरों को तकलीफें हुई हैं और हो रही हैं।
घरों में बैठे यही वे लोग हैं, जिन्हें मध्यमवर्ग कहते हैं। जिसे ही संघ अपने कुप्रचार का शिकार बनाता रहा है। इन्हें ही हिन्दू खतरे में रटाया गया है। इन्हें ही मुस्लिमों से डराकर रखा गया है। यही भाजपा का थोक में वोट है। आज जब मध्यमवर्ग के सोच में बदलाव आ रहा है। वह पलायन करते मजदूरों की दुख-तकलीफों से जुड़ रहा है, उनकी मदद के लिए राहत लेकर आगे आया, तब उसे कुप्रचार से भ्रमित नहीं किया जा सकता, इसीलिए संघ ने अपने स्वयंसेवकों से कह दिया है कि जब तक मजदूरों के पलायन का मुद्दा शांत नहीं हो जाता, तब तक वे न तो मोदी सरकार की तरफदारी करें और न ही पलायन करते मजदूरों के ऊपर किसी तरह की टिप्पणी करें, ऐसा करने से लोगों में अलग-थलग पड़ सकते हैं, लोग हमारी किसी बात पर भरोसा नहीं करेंगे।
5-7 स्वयंसेवकों से बातचीत के बाद मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि कोरोना में बहुत कुछ बदलेगा। लोगों का सोच बदलेगा। लोग खुद के दिमाग से सोचेंगे और किस रास्ते जाना है, यह भी खुद ही तय करेंगे। कोरोना के बाद लोगों को भेड़ बकरियों की तरह नहीं हांक सकेंगे। यही अच्छे संकेत हैं, जो कोरोना महामारी में मिल रहे हैं।

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