RSS ने शुरू की मप्र में शिक्षा केंद्र खोलने की तैयारी, नागपुर में शुरु हुए प्रशिक्षण, इंदुमतीजी दे रही ट्रेनिंग

वासुदेव शर्मा

भोपाल। केंद्र की मोदी सरकार की नई शिक्षा नीति कोलागू करने की दिशा में म.प्र. की शिवराज सरकार तेजी से बढ़ती हुई दिखाई दे रही है। मप्र सरकार के शिक्षा विभाग ने मिशन 10,000 के तहत जिलों से जानकारियां जुटानी शुरू कर दी हैं। उधर आरएसएस ने भी मप्र में शिक्षा केंद्र खोलने की तैयारियां शुरू कर दी हैं, नागपुर में संघ प्रमुख की देखरेख में प्रशिक्षण शुरू हो चुके हैं। पिछले दिनों संघ मुख्यालय में संघ की शिक्षाविद इंदुमतिजी ने शिक्षा के मुद्दे पर लंबा प्रबोधन देते हुए सरकार को शिक्षा की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाने की सलाह दी। एक तरफ मप्र सरकार का मिशन 10 हजार है, जिसके लागू होते ही 90 हजार स्कूलों में ताले लग जाएंगे वहीं दूसरी तरफ आरएसएस का शिक्षा केंद्र शुरू करने का अभियान है, जो स्कूलों में लगे तालों को खोलकर स्कूली शिक्षा को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराकर अपने हाथ में ले लेगा। इस तरह केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति के लागू होते ही मप्र की स्कूली शिक्षा और उसमें पढ़ाने वाले शिक्षकों के ऊपर नया संकट आ पड़ा है, जिसकी अनदेखी करने का मतलब है स्कूली शिक्षा को हमेशा हमेशा के लिए गंवा देना।

शिवराज सिंह की सहमति से खुलेंगे शिक्षा केंद्र
मप्र में शिक्षा केंद्र शुरू करने का आव्हान पिछले दिनों भोपाल में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने किया था। उन्होंने कहा था कि कोरोना से स्कूली शिक्षा प्रभावित हुई है, बच्चों की पढाई प्रभावित हो रही है, स्वयंसेवकों को इस क्षेत्र में भी सेवाभाव का काम करना चाहिए। उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की उपस्थिति में घोषणा की कि संघ मप्र में शिक्षा केंद्र चलाएगा, जिसमें रिटायर्ड शिक्षक एवं प्रोफेसर सेवाकार्य करेंगे। मुख्यमंत्री ने संघ प्रमुख की इस घोषणा का तालियां बजाकर स्वागत किया। संघ प्रमुख के इस ऐलान के तुरंत बाद स्कूल शिक्षा विभाग का मिशन 1000, मिशन 10,000 हजार में बदल गया। पहले मप्र सरकार 1000 स्कूलों में संसाधान लगाना चाहती थी, इस मिशन से सिर्फ 13 हजार स्कूल ही प्रभावित हो रहे थे, अब सरकार 10,000 स्कूलों में संसाधान लगाएगी और इससे 90 हजार स्कूल प्रभावित होंगे यानि पहले 13 हजार स्कूल बंद होने थे, अब 90 हजार स्कूल बंद हो जाएंगे, इसका मतलब है कि दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूल नहीं बचेंगे यहां आरएसएस के शिक्षा केंद्र संचालित होंगे।


सरकार का काम शिक्षा पर नियंत्रण करना नहीं 
मप्र में शिक्षा केंद्र शुरू करने की तैयारियां नागपुर में शुरू हो चुकी हैं, संघ मुख्यालय में पिछले दिनों संघ की शिक्षाविद इंदुमतिजी ने प्रबोधन देते हुए कहा कि अंग्रेजों के आने से पहले शिक्षा समाज के नियंत्रण में थी, सरकारों में कोई शिक्षा विभाग नहीं होता था, अंग्रेजों ने शिक्षा को अपने हाथ में ले लिया। संघ की शिक्षाविद आगे कहती हैं कि जब तक अंग्रेजों ने शिक्षा अपने हाथ में नहीं ली थी, उससे पहले 1822 से 1830 तक कभी शिक्षा विभाग नहीं था, तब सरकार का काम शिक्षा की सुरक्षा करना, सहायता करना ही था, शिक्षा का नियंत्रण करना, शिक्षा को निर्देशित करना, शिक्षा को संचालित करना ऐसा नहीं था। प्रशिक्षण में संघ शिक्षाविद जानकारी दे रही थीं कि 1822 से 1830 के बीच भारत में 5 लाख प्राथमिक स्कूल थे यानि 400 की जनसंख्या में एक स्कूल था। वे बताती हैं कि उस समय भारत विश्व का सबसे साक्षरता वाला देश था? वे आगे कहती हैं कि यदि हमें यदि 1822-1830 की स्थिति में भारत की शिक्षा व्यवस्था को लेना है, उसे भारतीय बनाना है, तब शिक्षा को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराना भी जरूरी है। संघ शिक्षकों को अधिक वेतन देकर उन्हें सुविधाभोगी बनाने को भी सही नहीं मानता है। संघ की शिक्षाविद इंदुमतिजी के लंबे प्रबोधन के शुरूआती अंश हैं, जिसे पूरा वीडियो सुनना हो गूगल पर जाकर सुन सकता है।

शिक्षा पर नियंत्रण चाहता है आरएसएस
संघ शिक्षाविद इंदुमतिजी के प्रबोधन के संक्षिप्त अंश से ही यह संकेत मिलते हैं कि संघ शिक्षा खासकर स्कूली शिक्षा पर नियंत्रण करना चाहता है, जिसकी तैयारी वह आजादी के बाद से ही कर रहा है, देशभर में शिशुमंदिर खोलने के पीछे उसकी यही मंशा है। यदि स्कूली शिक्षा संघ के नियंत्रण में आ गई, तब वह अपने विचारधारा के अनुसार समाज का निर्माण कर लेगा। उनकी विचारधारा का समाज कैसा होगा? एक ऐसा समाज जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार जैसे संसाधान सीमित लोगों के पास हों और समाज का बहुमत इनके अधीन रहे। इस तरह देखा जाए तो आरएसएस आम लोगों के बच्चों को शिक्षा के अधिकार से वंचित करना चाहता है।

संकट बड़ा है, इससे लडऩे की करनी होगी तैयारी
शिक्षा विभाग सबसे अधिक रोजगार देने वाला विभाग है, ऐसे में यदि यही नहीं रहा, तब रोजगार कहां मिलेंगे। संघ अपने शिक्षा केंद्रों में रिटायर्ड शिक्षक एवं स्वयंसेवकों से काम लेगा, जिसे वे सेवाकार्य समझकर मुफ्त में करेंगे, जैसा कि इंदुमतिजी कहती हैं कि शिक्षक को सुविधाभोगी नहीं होना चाहिए यानि उसे वेतन नहीं मिलना चाहिए। अब जरा सोचिए यदि आज के समय में यदि नौकरी नहीं मिलती है, यदि नौकरी मिल जाती है, वेतन नहीं मिलता है, तब कैसे जिंदा रहा जा सकता है? सोचिए, सोचना शुरू कीजिए, यही उचित समय है।

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